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1                      भूमंडालाधीश विश्ववन्द्य
..................ज्योतिर्लिंग श्री महाकालेश्वर
.... ..सुष्टारोपिप्रजानांप्रबलभव भयाद्यंनमस्यन्ति देवा।
.......योह्यव्यक्ते प्रविष्ठ: प्रणिहित मनसा धयानायुक्तात्मनांय:।
.......लोकानामादिदेव: सजयतु भगवान् श्री महाकालनामा।
.......विभ्राण: स्तेमलेखामहिवलययुतंव्यक्तलिंगंकपालम्॥
....................................................स्कन्दपुराण अवन्तीखण्ड 5-39-3

(प्रजा व सुष्टि के कारणरुप, भय-विनाशक, देवाराधित ध्यानस्थ महात्माओं के अव्यक्त हृदय में एकाग्ररुप से विराजित सोमलेखा कपाल और अहिवलय से मंडित आदिदेव ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर की जय-जयकार से पुनीत अवन्तिका नगरी युग-युग में सुनती चली आ रही है । अत्यंत श्रध्दा विगलित हो धार्मिक जन-मेदिनी अपने पापों व पुण्यों को जिसे समर्पित कर मुक्ति का मार्ग खोलती रही है। उस देवाधिदेव महाकाल का यशोगान करना और उसके प्रति भक्तिभावसे श्रध्दासहित नमन करना कौन नहीं चाहेगा ?)

2            आकाशे तारकं लिंग पाताले हाटकेश्वरम्।
...............मृत्युलोके महाकालं लिंगत्रयं नमोस्तुऽते॥
........................................................................- वराहपुराण

(जो भगवान् शिव आकाश में तारक, पाताल में हाटकेश्वर एवं मृत्युलोक में महाकाल बनकर विराजते हैं, उन्हें हम नमन करते हैं।)