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3            क्रीड़ाकुण्डलितोरंगश्वरतनूकारादिरुढाम्वरा।
.............नुस्वारं कलयन्नकारकचिराकारः क्ृपार्द्रप्रभुः॥।
.............विष्णोर्विश्वतनोरवन्तिनगरी हृत्पुण्रीकेवसन्‌ ।
............ओंकाराक्षर मूत्तिरस्यतु सदा कालोन्तकालो सताम्‌ ॥
.......................................महाकाल मन्दिर स्थित उदयादित्य के शिलालेख से

(क्रीड़ित एवं कुण्डविक्त सर्प से विनिर्मित अहिवलय तथा कुंडलिनी चक्र 'ऊ' आरम्भ मे रखकर अम्बर (आकाश) को अनुस्वार कल्पना करते हुए 'अ' रचिकृत वर्ण विष्णुदेवत्व के सम्मुख रखद्ध ओम प्रणवाकार स्वरुप से श्री शंकर क्ृपार्द्र हो जहाँ विष्णु के विराट में (विश्वतनु) अवन्तिनगरी हृद्गत पुण्डरीक (अष्टदल कमल) के केन्द्र में कमलदलों में भ्रमणशील 'प्राण' के द्वारा प्राणाणुओं से प्रदक्षिणा प्राप्त श्री महाकाल (नाभिदेशे महाकाल) प्रणवमूर्ति हो परावाणी अवन्ति में विराजमान प्रभु सज्जनों के अन्तकाल को निरस्त करते रहे।)

 

4          ऊँ महाकाल महाकाय, महाकाल जगत्पते।
...........महाकाल महायोगिन्‌ महाकाल नमोऽस्तुते॥

..................................- महाकाल स्त्रोत
(महाकाय, जगत्पति, महायोगी महाकाल को नमन)