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उज्जयिनी में महाकाल की प्रतिष्ठा अनजाने काल से है । शिवपुराण अनुसार नन्द से आठ पीढ़ी पूर्व एक गोप बालक द्वारा महाकाल की प्रतिष्ठा हुई । महाकाल शिवलिंग के रुप में पूजे जाते हैं। महाकाल की निष्काल या निराकार रुप में पूजा होती है। सकल अथवा साकार रुप में उनकी नगर में सवारी निकलती है।

महाकाल वन में अधिष्ठित होने से उज्जैन का ज्योतिर्लिंग भी महाकाल कहलाया अथवा महाकाल जिस वन में सुप्रतिष्ठ है, यह वन महाकाल के नाम से विख्यात हुआ। महाकाल के इस ज्योतिर्लिंग की पूजा अनजाने काल से प्रचलित है और आज तक निरंतर है। पुराणों में महाकाल की महिमा की चर्चा बार-बार हुई है। शिवपुराण के अतिरिक्त स्कन्दपुराण के अवन्ती खण्ड में भगवान् महाकाल का भक्तिभाव से भव्य प्रभामण्डल प्रस्तुत हुआ है। जैन परम्परा में भी महाकाल का स्मरण विभिन्न सन्दर्भों में होता ही रहा है।

महाकवि कालिदास ने अपने रघुवंश और मेघदूत काव्य में महाकाल और उनके मन्दिर का आकर्षण और भव्य रुप प्रस्तुत करते हुए उनकी करते हुए उनकी सान्ध्य आरती उल्लेखनीय बताई। उस आरती की गरिमा को रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी रेखांकित किया था।

...................महाकाल मन्दिरेर मध्ये
...................तखन, धीरमन्द्रे, सन्ध्यारति बाजे।

महाकवि कालिदास ने जिस भव्यता से महाकाल का प्रभामण्डल प्रस्तुत किया उससे समूचा परवर्ती बाड्मय इतना प्रभावित हुआ कि प्राय: समस्त महत्वपूर्ण साहित्यकारों ने जब भी उज्जैन या मालवा को केन्द्र में रखकर कुछ भी रचा तो महाकाल का ललित स्मरणअवश्य किया।