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सम्पूर्ण भारत ही एक पावन क्षेत्र है। उसके मध्य में अवन्तिका का पावन स्थान है। इसके
उत्तर में बदरी-केदार, पूर्व में पुरी, दक्षिण में रामेश्वर तथा पश्चिम में द्वारका है
जिनके प्रमुख देवता क्रमशः केदारेश्वर, जगन्नाथ, रामेश्वर तथा भगवान्‌ श्रीकृष्ण हैं।
अवन्तिका भारत का केन्द्रीय क्षेत्र होने पर भी अपने आप में एक पूर्ण क्षेत्र है, जिसके
उत्तर में दर्दुरेश्वर, पूर्व में पिंगलेश्वर, दक्षिण में कायावरोहणेश्वर तथा पश्चिम
में विल्वेश्वर महादेव विराजमान है। इस क्षेत्र का केन्द्र-स्थल महाकालेश्वर का मन्दिर
है। भगवान्‌ महाकाल क्षेत्राधिपति माने गये हैं। इस प्रकार भगवान्‌ महाकाल न केवल
उज्जयिनी क्षेत्र अपितु सम्पूर्ण भारत भूमि के ही क्षेत्राधिपति है। प्राचीन काल में
उज्जयिनी एक सुविस्तृत महाकाल वन में स्थित रही थी। यह वन प्राचीन विश्व में विश्रुत
अवन्ती क्षेत्र की शोभा बढ़ाता था। स्कन्द पुराण के अवन्तिखण्ड के अनुसार इस महावन में
अति प्राचीन काल में ऋषि, देव, यक्ष, किन्नर, गंधर्व आदि की अपनी-अपनी तपस्या-स्थली
रही है। अतः वहीं पर महाकाल वन में भगवान्‌ शिव ने देवोचित शक्तियों से अनेक
चमत्कारिक कार्य सम्पादित कर अपना महादेव नाम सार्थक किया। सहस्रों शिवलिंग इस वन
में विद्यमान थे। इस कुशस्थली में उन्होंने ब्रह्मा का मस्तक काटकर प्रायश्चित्त
किया था तथा अपने ही हाथों से उनके कपाल का मोचन किया था। महाकाल वन एवं
अवन्तिका भगवान्‌ शिव को अत्यधिक प्रिय रहे हैं, इस कारण वे इस क्षेत्र को कभी नहीं
त्यागते। अन्य तीर्थों की अपेक्षा इस तीर्थ को अधिक श्रेष्टत्व मिलने का भी यह एक कारण
है। इसी महाकाल वन में ब्रह्मा द्वारा निवेदित भगवान्‌ विष्णु ने उनके द्वारा प्रदत्त
कुशों सहित जगत्‌ कल्याणार्थ निवास किया था। उज्जैन का कुशस्थली नाम इसी कारण से
पड़ा। इस कारण यह नगरी ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश इन तीनों देवों का पुण्य-निवेश रही है।