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"उज्जयिनी'' नामकरण के पीछे भी इस प्रकार की पौराणिक गाथा जुड़ी है। ब्रह्मा द्वारा अभय
प्राप्त कर त्रिपुर नामक दानव ने अपने आतंक एवं अत्याचारों से देवों एवं देव-गण
समर्पित जनता को त्रस्त कर दिया। आखिरकार समस्त देवता भगवान्‌ शिव की शरण में
आये। भगवान्‌ शंकर ने रक्तदन्तिका चण्डिका देवी की आराधना कर उनसे महापाशुपतास्त्र
प्राप्त किया, जिसकी सहायता से वे त्रिपुर का वध कर पाये। उनकी इसी विजय के परिणाम
स्वरूप इस नगरी का नाम उज्जयिनी पड़ा। इसी प्रकार अंधक नामक दानव को भी इसी
महाकाल वन में भगवान्‌ शिव से मात खाना पड़ी, ऐसा मत्स्य पुराण में उल्लेख है।
परम-भक्त प्रह्‌लाद ने भी भगवान्‌ विष्णु एवं शिव से इसी स्थान पर अभय प्राप्त किया था।
भगवान्‌ शिव की महान्‌ विजय के उपलक्ष्य में इस नगरी को स्वर्ग खचित तोरणों एवं
यहॉ के गगनचुम्बी प्रासादों को स्वर्ग-शिखरों से सजाया गया था। अवन्तिका को इसी
कारण कनकश्रृंगा कहा गया। कालान्तर में इस वन का क्षेत्र उज्जैन नगर के तेजी से
विकास एवं प्रसार के कारण घटता गया। कालिदास के वर्णन से ज्ञात होता है कि उनके
समय में महाकाल मन्दिर के आसपास केवल एक उपवन था, जिससे गंधवती नदी का पवन
झुलाता रहता था। समय की विडम्बना! आज अवन्तिका उस उपवन से भी वंचित है।